ताजनगरी में 44 साल पहले जब सड़कों पर चले थे स्टीमर, चंबल के उफान ने ताजा कर दी यमुना की बाढ़


पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ चुकी चंबल उफान पर है। इसे देखते हुए आगरा के लोगों को 44 साल पहले वर्ष 1978 में यमुना नदी में आई बाढ़ की यादें ताजा हो गईं हैं। तब यमुना नदी का पानी आगरा की सड़कों और घरों में घुस आया था। बेलनगंज, फ्रीगंज, जीवनी मंडी, दरेसी समेत इलाकों में स्टीमर चलाने पड़े थे। सेना ने राहत कार्यों की कमान संभाली थी। फ्रीगंज, बेलनगंज, कचौड़ा बाजार, भैंरो बाजार, मोतीगंज, दरेसी में चार से 8 फुट तक पानी भर गया था। बेलनगंज की हवेलियों और दो-तीन मंजिला मकानों में रहने वाले लोग ऊपर की मंजिलों पर रहने चले गए थे। बस्तियों के लोगों को यहां से पलायन करना पड़ा था। एक दो दिन नहीं, बल्कि छह दिनों तक आगरा की सड़कों पर बाढ़ के कारण स्टीमर चलाए गए थे। मोतीगंज बाजार में चीनी, देसी खांड, नमक, दालों, आटा और सूजी के गोदाम में पानी भरने से सब बर्बाद हो गया था। व्यापारियों ने गोदामों में दीवार लगाई, पर यह कारगर नहीं रहा।

जब रंगा-बिल्ला के लिए स्टीमर से आई दिल्ली पुलिस

बेलनगंज के निवासी और मौजूदा विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल बताते हैं कि जिन दिनों बाढ़ आई, उसी दौरान कुख्यात अपराधी रंगा-बिल्ला की पहचान और पूछताछ के लिए दिल्ली पुलिस स्टीमर में बैठकर भैंरो बाजार आई थी। तब यहां केनरा बैंक थी, जिसके केस के सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने फोटो दिखाकर लोगों से जानकारी की। 

छतों से पहुंचाई राहत सामग्री

विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल बताते हैं कि बेलनगंज, फ्रीगंज, कचौड़ा बाजार, मोतीगंज समेत पुराने शहर में सड़कों पर 4 से 8 फुट तक पानी भरा हुआ था। तब हमने स्वयंसेवक के रूप में लोगों को राशन, पानी देकर राहत दिलाने का अभियान चलाया था। आपस में छतों के जुड़े होने से राहत कार्य आसान हो गया था।

एक परिवार के दो लोग बह गए थे 

बेलनगंज के दीपक खरे ने कहा कि मुझे याद है कि मथुरेशजी मंदिर के पास के मकान में फंसे परिवार को जब स्टीमर से निकालने का प्रयास हो रहा था, तब परिवार के चार सदस्य यमुना के तेज बहाव में बह गए थे। दो सदस्य ही बचाए जा सके। फाटक सूरजभान तक बाढ़ का पानी सड़कों और घरों में घुसा हुआ था।

बाजारों में हुआ था खासा नुकसान

एमजी रोड के प्रदीप वार्ष्णेय ने कहा कि मोतीगंज और पुराने शहर के बाजारों में दुकानों में पानी भर जाने से व्यापारी बर्बाद हो गए थे। तब संसाधन थे नहीं, इसलिए नुकसान ज्यादा हुआ था। 1978 की बाढ़ के बाद ही बैंकों की शाखाएं यमुना किनारे के बाजारों से शिफ्ट कर दी गई थीं। 



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