बांदा : रानी के साथ नवाब ने अंग्रेजों से लिया था मोर्चा, रानी और नवाब समेत 52 क्रांतिकारियों पर घोषित था इनाम


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बांदा। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बादशाह बहादुर शाह जफर, नाना राव साहब और बेगम हजरत महल जैसे क्रांतिकारियों के साथ बांदा नवाब अली बहादुर का नाम भी इतिहास के पन्नों में शामिल है।
बंगलौर और दिल्ली में अंग्रेजों की ओर से किए गए कत्लेआम के बाद नवाब अली बहादुर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत पर उतर आए। उन दिनों बांदा रियासत थी। यहां भी अराजकता फैल गई। अंग्रेजों ने नवाब अली बहादुर से सत्ता छीन ली और खुद काबिज हो गए। नवाब एक अच्छे घुड़सवार और निशानेबाज थे। अंग्रेजी सरकार ने नवाब, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब समेत 52 क्रांतिकारियों को जिंदा या मुर्दा पकड़वाने वाले को 10 हजार रुपये प्रति इनाम देने का एलान कर दिया। अंग्रेजों का यह आदेश तीन फरवरी 1858 के कोलकाता गजट में प्रकाशित हुआ।
नवाब अली बहादुर, लक्ष्मीबाई के मुंहबोले भाई थे। रानी ने उन्हें राखी बांधी थी। कालपी की जंग में लक्ष्मीबाई की शहादत से नवाब को बहुत सदमा पहुंचा। इस जंग में नवाब खुद भी जख्मी हो गए थे। 19 नवंबर 1857 को रात 8 बजे अंग्रेजी फौज के अफसरों ने नवाब और उनके फौजियों को घेरकर गिरफ्तार कर लिया। हालांकि कुछ इतिहासकारों ने इसे आत्मसमर्पण भी लिखा है। ब्रिटिश सरकार में नवाब के पास से बरामद महिलाओं के जेवरात और 8000 रुपये दिसंबर 1858 में इलाहाबाद के खजाने में जमा कर दिए। नवाब 1873 में बीमार पड़ गए। अंग्रेज सरकार ने उन्हें इलाज के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं दी, लेकिन बनारस नरेश ने अपनी जिम्मेदारी पर नवाब को इलाज के लिए बनारस बुलवा लिया। वहीं, 27 अगस्त 1873 को नवाब अली बहादुर सानी ने अंतिम सांस ली। इस दौरान वह अपने परिवार से भी दूर रहे। बनारस में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का मकबरा आज भी बनारस में उनकी याद ताजा करता है। इंदौर में नवाब के परपोते (प्रपौत्र) नवाब जुल्फिकार बहादुर अभी भी सपरिवार आबाद हैं।
फोटो-07बीएनडीपी-9 : सैय्यद अहमद मगरबी
नवाब को नहीं मिल सकी उनकी सल्तनत में दो गज जमीन
बांदा। नवाब परिवार के काफी नजदीकी रहे बांदा शहर के मशहूर मगरबी खानदान के सैय्यद अहमद मगरबी (मुन्ने) बताते हैं कि 1857 की जंगे आजादी के सूरमा नवाब अली बहादुर सानी ने महारानी लक्ष्मीबाई की एक आवाज पर अपनी नवाबी कुर्बान कर दी थी। रानी की सहायता के लिए अपनी सेना के साथ कालपी पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया था। अंतिम समय तक वहां उनके साथ रहे। नतीजे में अंग्रेजों ने उन्हें इंदौर में नजरबंद कर दिया। बहादुर शाह जफर की तरह नवाब अली बहादुर को भी बांदा में दो गज जमीन दफन के लिए न मिल सकी। सैय्यद अहमद कहते हैं कि ऐसे वीर सपूत पर हम सभी बांदा के बाशिंदों को गर्व है। (संवाद)

बांदा। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बादशाह बहादुर शाह जफर, नाना राव साहब और बेगम हजरत महल जैसे क्रांतिकारियों के साथ बांदा नवाब अली बहादुर का नाम भी इतिहास के पन्नों में शामिल है।

बंगलौर और दिल्ली में अंग्रेजों की ओर से किए गए कत्लेआम के बाद नवाब अली बहादुर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत पर उतर आए। उन दिनों बांदा रियासत थी। यहां भी अराजकता फैल गई। अंग्रेजों ने नवाब अली बहादुर से सत्ता छीन ली और खुद काबिज हो गए। नवाब एक अच्छे घुड़सवार और निशानेबाज थे। अंग्रेजी सरकार ने नवाब, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और नाना साहब समेत 52 क्रांतिकारियों को जिंदा या मुर्दा पकड़वाने वाले को 10 हजार रुपये प्रति इनाम देने का एलान कर दिया। अंग्रेजों का यह आदेश तीन फरवरी 1858 के कोलकाता गजट में प्रकाशित हुआ।

नवाब अली बहादुर, लक्ष्मीबाई के मुंहबोले भाई थे। रानी ने उन्हें राखी बांधी थी। कालपी की जंग में लक्ष्मीबाई की शहादत से नवाब को बहुत सदमा पहुंचा। इस जंग में नवाब खुद भी जख्मी हो गए थे। 19 नवंबर 1857 को रात 8 बजे अंग्रेजी फौज के अफसरों ने नवाब और उनके फौजियों को घेरकर गिरफ्तार कर लिया। हालांकि कुछ इतिहासकारों ने इसे आत्मसमर्पण भी लिखा है। ब्रिटिश सरकार में नवाब के पास से बरामद महिलाओं के जेवरात और 8000 रुपये दिसंबर 1858 में इलाहाबाद के खजाने में जमा कर दिए। नवाब 1873 में बीमार पड़ गए। अंग्रेज सरकार ने उन्हें इलाज के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं दी, लेकिन बनारस नरेश ने अपनी जिम्मेदारी पर नवाब को इलाज के लिए बनारस बुलवा लिया। वहीं, 27 अगस्त 1873 को नवाब अली बहादुर सानी ने अंतिम सांस ली। इस दौरान वह अपने परिवार से भी दूर रहे। बनारस में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस महान स्वतंत्रता सेनानी का मकबरा आज भी बनारस में उनकी याद ताजा करता है। इंदौर में नवाब के परपोते (प्रपौत्र) नवाब जुल्फिकार बहादुर अभी भी सपरिवार आबाद हैं।

फोटो-07बीएनडीपी-9 : सैय्यद अहमद मगरबी

नवाब को नहीं मिल सकी उनकी सल्तनत में दो गज जमीन

बांदा। नवाब परिवार के काफी नजदीकी रहे बांदा शहर के मशहूर मगरबी खानदान के सैय्यद अहमद मगरबी (मुन्ने) बताते हैं कि 1857 की जंगे आजादी के सूरमा नवाब अली बहादुर सानी ने महारानी लक्ष्मीबाई की एक आवाज पर अपनी नवाबी कुर्बान कर दी थी। रानी की सहायता के लिए अपनी सेना के साथ कालपी पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया था। अंतिम समय तक वहां उनके साथ रहे। नतीजे में अंग्रेजों ने उन्हें इंदौर में नजरबंद कर दिया। बहादुर शाह जफर की तरह नवाब अली बहादुर को भी बांदा में दो गज जमीन दफन के लिए न मिल सकी। सैय्यद अहमद कहते हैं कि ऐसे वीर सपूत पर हम सभी बांदा के बाशिंदों को गर्व है। (संवाद)



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