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बांदा : डब्लूएचओ की टीम ने त्रिवेणी गांव में डाला डेरा, काली खांसी से तीन बच्चों की मौत के बाद जागा स्वास्थ्य महकमा

ByNews Desk

Aug 25, 2022


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बांदा। त्रिवेणी गांव में 11 दिन में तीन बच्चों की मौत के बाद गुरुवार को डब्लूएचओ की टीम ने भी डेरा डाल दिया। स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ घर-घर जाकर बीमार बच्चों और अन्य ग्रामीणों को दवाएं दीं। वैक्सीनेशन भी हुआ। उधर, दो और बीमार बच्चों का स्वाब का नमूना लेकर जांच के लिए लखनऊ भेजा गया है। हालांकि पूर्व में सात बच्चों के भेजे गए नमूने की रिपोर्ट अब तक नहीं आई है।
गांव में डिप्थीरिया से सबसे पहली मौत दिलीप यादव के चार वर्षीय पुत्र अंशुल की हुई थी। इसकी जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। स्वास्थ्य विभाग अंश (10) व उमंग (10) की मौत भी डिप्थीरिया की वजह से होना मान रहा है। दो बच्चे मुस्तफा (10) व रुबीना (8) कानपुर में भर्ती हैं। अन्य बच्चे भी बीमार हैं, हालांकि उन्हें वायरल फीवर बताया जा रहा है।
गुरुवार को दंत रोग चिकित्सक डॉ. एसपी सिंह और आयुष विभाग की डॉ. अर्चना भारती ने लगभग 50 बच्चों की जांच की। गले में दर्द, सूजन व बुखार होने पर भाग्यांश व तमन का नमूना जांच के लिए लखनऊ भेजा गया। इन्हें मिलाकर अब तक कुल 9 बच्चों के नमूने भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा 18 लोगों में मलेरिया की आशंका पर स्लाइड बनाई गई है।
डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि गुरुवार को 100 घरों का सर्वे किया गया। बीमार लोगों की सूची तैयार की गई है। गांव में छह स्वास्थ्य कैंप लगवाए गए हैं। दो चिकित्सक सहित प्रभारी चिकित्सा अधिकारी व मुख्य चिकित्सा अधिकारी अनिल श्रीवास्तव की टीम भ्रमण कर इलाज कर रही है। टीम में एमडी शरीफ, जियाउद्दीन, लैब टेक्नीशियन अभिषेक खरे, दिनेश कुमार, अभय प्रताप आदि शामिल रहे।
मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल से टरकाया
बांदा। जान गंवाने वाले बच्चों के परिजनों ने आरोप लगाया कि मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में आरजू और मिन्नत करने के बाद भी डॉक्टरों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने टरका दिया। त्रिवेणी गांव निवासी अनिल विश्वकर्मा ने आरोप लगाया कि मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर नहीं सुनते। बीमार बेटे अंश की हालत गंभीर थी। डॉक्टरों से देखने के लिए गिड़गिड़ाते रहे, पर किसी ने नहीं सुना। उनका जवाब होता था, चलो, आ रहे हैं। लेकिन नहीं आए। बाद में कानपुर रेफर कर दिया। कमोवेश यही बात मृत अंशुल के पिता दिलीप यादव और उमंग के पिता बच्चा वर्मा ने कही। (संवाद)
बच्चों को बाहर खेलने नहीं दे रहे
बांदा। सदर तहसील और बड़ोखर खुर्द ब्लॉक क्षेत्र अंतर्गत त्रिवेणी गांव की आबादी लगभग दो हजार है। इन दिनों यहां 10-12 वर्ष तक के करीब 50 बच्चे बीमार हैं। इनमें अधिकांश वायरल फीवर व जुकाम-खांसी के हैं। अभिभावक अपने बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए दूसरे बच्चों के साथ खेलने नहीं दे रहे। गांव के राजकुमार, सुमित, दिलीप यादव, सुमेरा, रामपाल आदि का कहना है कि लोगों में दहशत है। (संवाद)
डिप्थीरिया रोग का खतरा बच्चों में ज्यादा रहता है। यह संक्रामक बीमारी है। एक-दूसरे के संपर्क में आने से संक्रमण फैलता है। इसे गला घोंटू व काली खांसी भी कहते हैं। सुरक्षा ही इस रोग से बचाव है। – डॉ. करन राजपूत, वरिष्ठ फिजीशियन, मेडिकल कॉलेज, बांदा।

बांदा। त्रिवेणी गांव में 11 दिन में तीन बच्चों की मौत के बाद गुरुवार को डब्लूएचओ की टीम ने भी डेरा डाल दिया। स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ घर-घर जाकर बीमार बच्चों और अन्य ग्रामीणों को दवाएं दीं। वैक्सीनेशन भी हुआ। उधर, दो और बीमार बच्चों का स्वाब का नमूना लेकर जांच के लिए लखनऊ भेजा गया है। हालांकि पूर्व में सात बच्चों के भेजे गए नमूने की रिपोर्ट अब तक नहीं आई है।

गांव में डिप्थीरिया से सबसे पहली मौत दिलीप यादव के चार वर्षीय पुत्र अंशुल की हुई थी। इसकी जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। स्वास्थ्य विभाग अंश (10) व उमंग (10) की मौत भी डिप्थीरिया की वजह से होना मान रहा है। दो बच्चे मुस्तफा (10) व रुबीना (8) कानपुर में भर्ती हैं। अन्य बच्चे भी बीमार हैं, हालांकि उन्हें वायरल फीवर बताया जा रहा है।

गुरुवार को दंत रोग चिकित्सक डॉ. एसपी सिंह और आयुष विभाग की डॉ. अर्चना भारती ने लगभग 50 बच्चों की जांच की। गले में दर्द, सूजन व बुखार होने पर भाग्यांश व तमन का नमूना जांच के लिए लखनऊ भेजा गया। इन्हें मिलाकर अब तक कुल 9 बच्चों के नमूने भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा 18 लोगों में मलेरिया की आशंका पर स्लाइड बनाई गई है।

डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि गुरुवार को 100 घरों का सर्वे किया गया। बीमार लोगों की सूची तैयार की गई है। गांव में छह स्वास्थ्य कैंप लगवाए गए हैं। दो चिकित्सक सहित प्रभारी चिकित्सा अधिकारी व मुख्य चिकित्सा अधिकारी अनिल श्रीवास्तव की टीम भ्रमण कर इलाज कर रही है। टीम में एमडी शरीफ, जियाउद्दीन, लैब टेक्नीशियन अभिषेक खरे, दिनेश कुमार, अभय प्रताप आदि शामिल रहे।

मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल से टरकाया

बांदा। जान गंवाने वाले बच्चों के परिजनों ने आरोप लगाया कि मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में आरजू और मिन्नत करने के बाद भी डॉक्टरों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने टरका दिया। त्रिवेणी गांव निवासी अनिल विश्वकर्मा ने आरोप लगाया कि मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर नहीं सुनते। बीमार बेटे अंश की हालत गंभीर थी। डॉक्टरों से देखने के लिए गिड़गिड़ाते रहे, पर किसी ने नहीं सुना। उनका जवाब होता था, चलो, आ रहे हैं। लेकिन नहीं आए। बाद में कानपुर रेफर कर दिया। कमोवेश यही बात मृत अंशुल के पिता दिलीप यादव और उमंग के पिता बच्चा वर्मा ने कही। (संवाद)

बच्चों को बाहर खेलने नहीं दे रहे

बांदा। सदर तहसील और बड़ोखर खुर्द ब्लॉक क्षेत्र अंतर्गत त्रिवेणी गांव की आबादी लगभग दो हजार है। इन दिनों यहां 10-12 वर्ष तक के करीब 50 बच्चे बीमार हैं। इनमें अधिकांश वायरल फीवर व जुकाम-खांसी के हैं। अभिभावक अपने बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए दूसरे बच्चों के साथ खेलने नहीं दे रहे। गांव के राजकुमार, सुमित, दिलीप यादव, सुमेरा, रामपाल आदि का कहना है कि लोगों में दहशत है। (संवाद)

डिप्थीरिया रोग का खतरा बच्चों में ज्यादा रहता है। यह संक्रामक बीमारी है। एक-दूसरे के संपर्क में आने से संक्रमण फैलता है। इसे गला घोंटू व काली खांसी भी कहते हैं। सुरक्षा ही इस रोग से बचाव है। – डॉ. करन राजपूत, वरिष्ठ फिजीशियन, मेडिकल कॉलेज, बांदा।



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