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स्थिति सुलझाने की बजाय आपसी लड़ाई में उलझा रहा आईओए, राष्ट्रहित के नाम पर मिली राहत

ByNews Desk

Aug 19, 2022


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भारतीय ओलंपिक संघ को सरकार के दखल के बाद सर्वोच्च अदालत से फौरी राहत जरूर मिल गई है, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से प्रशासकों की समिति की तैनाती के लिए वह खुद जिम्मेदार है। हाईकोर्ट ने आईओए को अपने संविधान में संशोधन करने के लिए लंबा समय दिया। संशोधन की बजाय आईओए अपनी आपसी लड़ाई में उलझा रहा। संघ में गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच गई, जिसके चलते आईओए न तो अपनी लड़ाई एकजुट होकर लड़ पाया और न ही अदालत के आदेश का पालन कर पाया। अब भारतीय खिलाडिय़ों के देश के झंडे तले नहीं खेलने की कीमत पर उसने सरकार का साथ पाकर सर्वोच्च अदालत से तात्कालिक राहत पाई।
आदेश लागू होने पर कोई भी पदाधिकारी पद पर नहीं रहेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जो आदेश पारित किया है। अगर वह लागू हो जाता है तो आईओए में लंबे समय से कुर्सियों पर जमे सारे पदाधिकारियों की विदाई हो जाएगी। अदालत ने साफ किया है कि किसी भी पद पर तीन कार्यकाल पूरे करने वाला व्यक्ति आगे किसी पद पर नहीं रहेगा, जबकि स्पोट्र्स कोड में अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष पर कूलिंग ऑफ समेत चार साल के तीन कार्यकाल की सीमा लागू होती है। सारे पदाधिकारियों के बाहर होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय खेल संघों में भारत की दावेदारी खत्म हो जाएगी। यही नहीं आदेश में यह भी कहा गया है कि कोई भी चार्जशीटेड व्यक्ति आईओए में किसी पद पर नहीं रह सकेगा। स्पोट्र्स कोड में अपराधी करार दिए जाने के बाद किसी पद पर नहीं रहने का प्रावधान है। 

राज्य संघों के वोट खत्म होने पर राष्ट्रीय खेल पर लगेगा प्रश्न चिह्न
आईओए को सबसे बड़ा झटका राज्य ओलंपिक संघों के वोटिंग अधिकार खत्म होने पर लगा। राष्ट्रीय खेल आईओए के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इन खेलों में राज्यों की टीमें भेजने का अधिकार राज्य ओलंपिक संघों का है। ऐसे में वोटिंग अधिकार खत्म होने पर राज्य अगर इन खेलों में टीमें ही नहीं भेजें तो राष्ट्रीय खेल के आयोजन पर ही प्रश्न चिह्न लग जाएगा। आईओए और सरकार को इस बात का बड़ा डर था, क्यों कि उसकी ओर से गुजरात के छह शहरों में दो माह बाद राष्ट्रीय खेल कराए जा रहे हैं। यही नहीं आदेश में वोटिंग का अधिकार सिर्फ ओलंपिक खेलों में शामिल राष्ट्रीय खेल संघों को दिया गया है। ऐसे में कबड्डी, खो-खो, योग, मलखंब जैसे खेल जो सरकार के एंजेडे में हैं, उनका भविष्य पर ही सवाल खड़ा हो रहा है। 

आईओसी सत्र पर खड़ा होता संकट
इसके अलावा आईओए और सरकार को यह भी डर था कि अगर आईओसी ने कोई कार्रवाई की तो अगले वर्ष भारत में होने वाला आईओसी सत्र पर संकट खड़ा हो जाएगा। यही कारण था कि आईओए और सरकार ने मिलकर ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के प्रतिबंधित होने का हवाला देकर सर्वोच्च अदालत से तात्कालिक राहत पाई।

विस्तार

भारतीय ओलंपिक संघ को सरकार के दखल के बाद सर्वोच्च अदालत से फौरी राहत जरूर मिल गई है, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से प्रशासकों की समिति की तैनाती के लिए वह खुद जिम्मेदार है। हाईकोर्ट ने आईओए को अपने संविधान में संशोधन करने के लिए लंबा समय दिया। संशोधन की बजाय आईओए अपनी आपसी लड़ाई में उलझा रहा। संघ में गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच गई, जिसके चलते आईओए न तो अपनी लड़ाई एकजुट होकर लड़ पाया और न ही अदालत के आदेश का पालन कर पाया। अब भारतीय खिलाडिय़ों के देश के झंडे तले नहीं खेलने की कीमत पर उसने सरकार का साथ पाकर सर्वोच्च अदालत से तात्कालिक राहत पाई।

आदेश लागू होने पर कोई भी पदाधिकारी पद पर नहीं रहेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने जो आदेश पारित किया है। अगर वह लागू हो जाता है तो आईओए में लंबे समय से कुर्सियों पर जमे सारे पदाधिकारियों की विदाई हो जाएगी। अदालत ने साफ किया है कि किसी भी पद पर तीन कार्यकाल पूरे करने वाला व्यक्ति आगे किसी पद पर नहीं रहेगा, जबकि स्पोट्र्स कोड में अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष पर कूलिंग ऑफ समेत चार साल के तीन कार्यकाल की सीमा लागू होती है। सारे पदाधिकारियों के बाहर होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय खेल संघों में भारत की दावेदारी खत्म हो जाएगी। यही नहीं आदेश में यह भी कहा गया है कि कोई भी चार्जशीटेड व्यक्ति आईओए में किसी पद पर नहीं रह सकेगा। स्पोट्र्स कोड में अपराधी करार दिए जाने के बाद किसी पद पर नहीं रहने का प्रावधान है। 

राज्य संघों के वोट खत्म होने पर राष्ट्रीय खेल पर लगेगा प्रश्न चिह्न

आईओए को सबसे बड़ा झटका राज्य ओलंपिक संघों के वोटिंग अधिकार खत्म होने पर लगा। राष्ट्रीय खेल आईओए के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इन खेलों में राज्यों की टीमें भेजने का अधिकार राज्य ओलंपिक संघों का है। ऐसे में वोटिंग अधिकार खत्म होने पर राज्य अगर इन खेलों में टीमें ही नहीं भेजें तो राष्ट्रीय खेल के आयोजन पर ही प्रश्न चिह्न लग जाएगा। आईओए और सरकार को इस बात का बड़ा डर था, क्यों कि उसकी ओर से गुजरात के छह शहरों में दो माह बाद राष्ट्रीय खेल कराए जा रहे हैं। यही नहीं आदेश में वोटिंग का अधिकार सिर्फ ओलंपिक खेलों में शामिल राष्ट्रीय खेल संघों को दिया गया है। ऐसे में कबड्डी, खो-खो, योग, मलखंब जैसे खेल जो सरकार के एंजेडे में हैं, उनका भविष्य पर ही सवाल खड़ा हो रहा है। 

आईओसी सत्र पर खड़ा होता संकट

इसके अलावा आईओए और सरकार को यह भी डर था कि अगर आईओसी ने कोई कार्रवाई की तो अगले वर्ष भारत में होने वाला आईओसी सत्र पर संकट खड़ा हो जाएगा। यही कारण था कि आईओए और सरकार ने मिलकर ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के प्रतिबंधित होने का हवाला देकर सर्वोच्च अदालत से तात्कालिक राहत पाई।



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